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01st Dec 2016 - राष्ट्रीय लोक दल

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01 December 2016

01st Dec 2016 - राष्ट्रीय लोक दल

01 दिसम्बर 2016

 

प्रकाशनार्थ

लखनऊ 1 दिसम्बर। उत्तर प्रदेश सरकार के माननीय मुख्यमंत्री ने वित्तीय वर्ष 2016-2017 को “किसान वर्ष और युवा वर्ष” विधान सभा में बजट प्रस्तुत करते समय घोषित किया था। साथ ही पूरे वर्ष किसानों और युवाओं की बेहतरी के लिए विभिन्न योजनाओं पर कार्य करने का वादा किया था परन्तु वह घोषणा और योजनाएं केवल विधानसभा के सदन के अन्दर ही रह गई। प्रदेश के किसानों को निराषा ही हाथ लगी है। प्रमाण स्वरूप कहा जा सकता है कि चार वर्षो में इस वर्ष गन्ना मूल्य में 25 रू प्रति कुन्तल की ही बढ़ोत्तरी की गई जबकि 4 वर्ष पहले की लागत और अब की लागत में लगभग 150 रूपये प्रति कुन्तल अधिक खर्च हो रहा है ऐसी स्थिति में 25 रूपये प्रति कुन्तल बढ़ाने से किसानों के आंसू भी नहीं पोंछे जा सकते है। 

इसी प्रकार बेरोजगार कृषि स्नातकों एवं कृषि में प्रषिक्षित युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए “एग्री जंक्षन योजना” संचालित की गई परन्तु कृषि स्नातकों एवं युवओं को निराषा ही हाथ लगी जो किसान मित्र बने वे स्वयं में असंतुष्ट हैं। प्रदेश के गन्ना किसानों के अवषेश गन्ना मूल्य के भुगतान के लिए 1336 करोड़ रूपये के बजट की व्यवस्था की गई परन्तु बकाये पर किसानों को मिलने वाले ब्याज को मिल मालिको के पक्ष में माफ कर दिया जिससे यह सिद्व हुआ कि सरकार पूंजीपतियों की हितैषी है और किसान विरोधी है। गन्ना एवं अन्य कृषि उपज को मिलों एवं बाजार तक ले जाने के लिए वर्ष 2016-2017 में 120 करोड़ की बजट व्यवस्था प्रस्तावित की गई। गांवों के सम्पर्क मार्गो की स्थिति आज भी दयनीय है आखिर निर्माण एवं सृदृढ़ीकरण के कार्यो में कही न कही प्रष्नचिन्ह अवष्य लगता है।

प्रदेश के 73 जनपदों में ओलावृष्टि एवं अतिवृष्टि से फसलों की क्षति 4498 करोड़ रूपये स्वीकृत किये गये जोकि नाकाफी रही। किसान रोता रहा और धन की बंदरबाँट होती रही। इसी प्रकार 50 जनपद सूखाग्रस्त घोषित हुये तथा क्षतिपूर्ति के लिए केवल 2057 करोड़ की योजना तैयार की गई। यदि दोनो ही क्षतिपूर्ति की योजनाओं को देखे तो सरकार द्वारा किसानों की चिंता का वास्तविक दृष्य सामने आ जाता है। 

लघु और सीमान्त कृषकों के लिए अनुदान पर कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराने में सरकार द्वारा प्राथमिकता के आधार पर घ्यान नहीं दिया गया अतः निराषा ही हाथ लगी। फसलों के लिए खाद वितरण का लक्ष्य 2015-16 में 89 लाख मीट्रिक टन का जिसे आंकड़ों की बाजीगरी से उलटकर 98 लाख मीट्रिक टन किया गया जो 73 जनपदों के लिए असंन्तोश जनक है।

किसानों को खाद और बीज के लिए फसली ऋण उपलब्ध कराने में बैंको के दलालों और कमीशनखोरों की ही चलती है और किसान कर्ज में डूबता चला जाता है और अन्ततोगत्वा आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है क्योंकि प्रषासन उन्हें समय समय पर कर्ज अदा करने के लिए प्रताडि़त करता है।

देश के प्रधानमंत्री ने नोटबंदी करके पूरे देश के किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, सरकारी कर्मचारियों आदि को सब कुछ छोड़कर बैंक और ए0टी0एम0 के दरवाजे पर लाइन लगाने को मजबूर कर दिया। किसान की रबी का फसल की बुवाई होनी है। उसे बीज और खााद आदि की उपलब्धता नोटों के अभाव में नहीं हो पा रही है, हजारों कल कारखाने बंद हो चुके हैं, व्यापार ठप हो गया है सरकारी कर्मचारी अपना वेतन एकमुष्त नहीं पा सकता। इस प्रकार की विडम्बना केन्द्र सरकार द्वारा तुगलकी फरमान के द्वारा पैदा की गई है। यदि केन्द्र सरकार के पास व्यवस्था करने की क्षमता नही थी तो ऐसी तानाषाही की क्या आवष्यकता थी। आज किसान का धान और आलू खरीद के क्रय केन्द्र नोटों के अभाव में बंद पड़े है और किसान मारा मारा फिर रहा है। देश का कोई भी व्यक्ति अपनी खून पसीने की कमाई आवष्यकता पड़ने पर बैंक से नहीं पा सकता यही कारण है कि नोटो के अभाव में सैकड़ों लोगो की जान चली गई। 

दिनांक 5 दिसम्बर को जन्तर मन्तर नई दिल्ली में राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा0 चै0 अजित सिंह एवं राष्ट्रीय महासचिव मा0 जयन्त चैधरी के आवाहन पर उत्तर प्रदेश के किसानों का जमावड़ा होगा जिसमें किसानों का कर्ज माफ करने एवं प्रदेश तथा केन्द्र सरकार का कृषि बजट बढ़ाकर कुल बजट का 40 प्रतिशत करने की मांग प्रमुख रूप से होगी। जब तक देश का किसान खुशहाल नहीं होगा तब तक देश का विकास संतोषजनक नहीं होगा। चिंता का विषय यह है कि कृषि प्रधान देश में किसान ही सबसे दुखी है वह अपना खून पसीना बहाकर फसल तैयार करता है परन्तु व्यवस्था के वष में होने के कारण अपनी फसल बेचने का भाव वह स्वयं निष्चित नहीं कर सकता उसका भाव सरकार में बैठे लोग तय करते हैं।  

(डाॅ0 मसूद अहमद)

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